polio drops are necessary for life Sachi Shiksha Hindi

‘दो बूंद जिंदगी की’ ऐसी पंक्तियां आपने अकसर गांवों-शहरों में सुनी होंगी, जो पोलियो टीकाकरण अभियान के प्रचार का अहम हिस्सा होती हैं। नि:संदेह ये दो बूंदें जिंदगी के लिए कितनी आवश्यक है इसका अहसास पोलिया ग्रस्त इन्सान से ज्यादा और कोई नहीं बता सकता। पोलियो से अधीर होकर इन्सान नरकीय जिंदगी जीने को विवश हो जाता है।

लाचार व बेबस लम्हे उसे हर समय तीखे तीरों की मानिंद सलते रहते हैं। पोलियो बीमारी जन्मजात नहीं होती, अपितु कहीं न कहीं हमारी लापरवाही इस रोग के पनपने में सहायक बनती है। एक मां-बाप का दायित्व बच्चे पैदा करने से लेकर उसकी हर सार-संभाल से जुड़ा रहता है। खासकर बचपन के दिनों में नौनिहालों की परवरिश एक चुनौती से कम नहीं है। पर्यावरण की अशुद्धता के कारण बीमारियां बच्चों को साफ्ट टारगेट बनाती हैं।

लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय समयानुसार अभियान चलाकर बीमारियों के कुचक्र को तोड़ता रहता है। ऐसे में अभिभावकों का यह फर्ज बनता है कि वे स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए जा रहे टीकाकरण अभियानों में अपने बच्चों को अवश्य लेकर जाएं, जिससे उनके भविष्य को बीमारियों से सुरक्षित किया जा सके। ‘दो बूंद जिंदगी की’ जैसे अभियान वास्तव में ही नौनिहाल के जीवन का निरोग मंत्र है।

भारत ने साढ़े तीन दशकों के संघर्ष के बाद 13 जनवरी 2014 को पोलियो बीमारी पर जीत दर्ज की, जिस पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भारत को ‘पोलियो मुक्त’ घोषित किया गया था। दरअसल जनवरी 2011 से जनवरी 2014 तक देश में तीन वर्षों के अंतराल तक पोलियो का एक भी मामला देश में सामने नहीं आया। यह सच्चाई है कि पोलियो का कोई इलाज नहीं होता, लेकिन पोलियो का टीका बार-बार देने से बच्चों को जीवन भर इससे सुरक्षा मिल जाती है।

पोलियो एक ऐसा रोग है, जिसने कई बार वर्षभर में ही हजारों बच्चों को पंगु बना डाला था। वर्ष 1988 में तो पोलियो के सर्वाधिक मामले सामने आए थे, जब करीब साढ़े तीन लाख बच्चे इससे संक्रमित हुए थे, लेकिन पल्स पोलियो अभियान के चलते वर्ष 2015 में दुनिया भर से पोलियो के मात्र 74 मामले ही सामने आए थे। अक्तूबर 1994 में देशभर में ‘पोलियो उन्मूलन अभियान’ की शुरूआत की गई, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए।

पोलियो को जड़ से उखाड़ फैंकने के अभियान को ‘दो बूंद जिंदगी की’ नाम दिया गया था। 20 लाख से अधिक कार्यकर्ताओं ने इस अभियान से जुड़कर घर-घर जाकर पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाकर देश को पोलियो मुक्त बनाने में अमूल्य योगदान दिया था।

बुखार, थकावट जैसे लक्षण हों तो तुरंत डाक्टर की सलाह लें

पोलियो के करीब 95 फीसदी मामलों में बच्चों में कोई लक्षण नहीं दिखाई देता, जिन्हें असिम्प्टोमैटिक (स्पर्शोन्मुखी) मामले कहा जाता है।

शेष 5 फीसदी मामलों को अबॉर्टिव पोलियो, नन-पैरालिटिक पोलियो और पैरालिटिक पोलियो में वर्गीकृत किया जाता है। अबॉर्टिव पोलियो में बुखार, थकावट, सिरदर्द, गले में खरास, मितली, दस्त जैसे लक्षण नजर आते हैं। नन-पैरालिटिक पोलियो में अबॉर्टिव पोलियो के लक्षण तो शामिल होते ही हैं, साथ ही रोशनी के प्रति संवेदनशीलता और गर्दन की अकड़न जैसे कुछ न्यूरोलॉजिकल लक्षण भी दिखाई देते हैं।

पैरालिटिक पोलियो में वायरल जैसे लक्षणों के बाद मांसपेशियों में दर्द और असंयमित पक्षाघात जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। पोलियो एक बहुत ही संक्रामक बीमारी है, जो लोगों के बीच सम्पर्क से, नाक और मुंह के स्रावों द्वारा और संदूषित विष्ठा के संपर्क में आने से फैलता है। पोलियो वायरस शरीर में मुंह के जरिये प्रवेश करता है, पाचन नली में द्विगुणित होता है, जहां यह आगे भी द्विगुणित होता रहता है। बच्चों को आजीवन विकलांग बना देने वाली इस भयानक बीमारी से बचाने के लिए नवजात शिशुओं से लेकर पांच वर्ष तक के बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाई जाती है।

पोलियो में होते हैं तीन तरह के वायरस

पोलियो के तीन तरह के वायरस होते हैं पीवी-1, पीवी-2 और पीवी-3 और दो वर्ष पूर्व तक पीवी-2 वायरस से ही देश में पोलियो की वैक्सीन बनाई जाती रही है, लेकिन पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत को भी टाइप-2 पोलियो वायरस से मुक्त देश घोषित किए जाने के बाद  वैश्विक स्तर पर सबसे खतरनाक माने जाते रहे टाइप-2 वायरस से वैक्सीन का निर्माण बंद कर दिया गया था और इस वायरस को भी नष्ट कर दिया गया था।

चूंकि अभी भी पाकिस्तान और अफगानिस्तान सरीखे पिछड़े देशों में टाइप-1 और टाइप-3 पोलियो के कुछ मरीज मिल रहे हैं, इसलिए ऐहतियात के तौर पर कुछ समय से भारत के पोलियो टीकाकरण अभियान में इन्हीं दोनों टाइप के पोलियो वायरस के विरूद्ध प्रतिरोधी क्षमता पैदा करने के लिए ही पोलियो रही थी।

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