True proof

पूज्य गुरु जी के पवित्र वचनों पर आधारित शिक्षादायक सत्य प्रमाण True proof
‘सत्संग की बड़ी महिमा है।

यदि जीव को किसी संत की सोहबत नसीब हो जाए और उस पर भरोसा आ जाए तो जिन्दगी के आदर्श की प्राप्ति का बीमा हो जाता है।’ उपरोक्त वचनोंनुसार पूज्य गुरु संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने सत्संग की महिमा, संतों के वचनों पर अमल करने के बारे फरमाया कि ‘संतों ने तो वचन करने होते हैं लेकिन मानना न मानना इन्सान की मर्जी होती है।’

इसी बात पर पूज्य गुरु जी ने साध-संगत में एक बात इस प्रकार बताई:-

एक गांव में एक कोई सन्त आए। जब सन्त आए तो लोग मिलने गए। उस गांव का एक जमींदार भाई जो भोले स्वभाव का था, उसे उसकी घरवाली कहने लगी कि अपने गांव में संत आए हुए हैं आप भी जाओ और कोई वचन ले आओ। वह जमींदार कहने लगा कि मैं तो नहीं जाता क्योंकि मैंने सुना है संत श्राप दे देते हैं। उसकी घरवाली उसे कहने लगी कि नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता। जो रूहानी सन्त होते हैं वो किसी को भी श्राप नहीं देते।

घरवाली के कहने पर जमींदार जहां सन्त जी आए हुए थे, वहां पर चला गया। वह जमींदार पहले से ही डरा हुआ था। जैसे ही वह संतों के पास गया, संत सामने ही बैठे हुए थे। संतों की आवाज में बड़ी कशिश होती है। संतों ने ऊंची आवाज में कहा, आओ जी, कैसे आए? संतों ने जब ऊँची आवाज में कहा तो जमीदार की कंपकपी छूट गई। उसने सोचा संत किसी और को कह रहे हैं। वह इधर-उधर देखने लगा।

फिर संतों ने दूसरी बात यह कह दी कि इधर-उधर क्या देखते हो? उसने सोचा कि ये संत अब नहीं छोड़ेंगे। ये तो मुझे ही कह रहे हैं। वापिस घूम कर भागने लगा, तो संतों ने कहा, चल दिए! तो वह भाग लिया कि अब तो भाग लो अब नहीं बचेंगे। वास्तव में संत जी किसी विषय के प्रकरण पर संगत में बात कर रहे थे लेकिन उस जमींदार भाई ने सोचा कि संत मुझे ही कह रहे हैं।

जब जमींदार घर आया तो घरवाली कहने लगी, क्या संतों के वचन ले आए? जमींदार कहने लगा, हां मैं वचन ले आया हूँ। घर वाली कहने लगी, फिर सुमिरन किया करो। जमींदार सीधा-सादा जाट था। उसने सुमिरन करना शुरू कर दिया (संतों के उपरोक्त तीन वचनों को रटना शुरू कर दिया)। संतों के वचनों (आओ जी, कैसे आए, इधर-उधर क्या देख रहे हो, चल दिए) का जाप करना शुरू कर दिया। उसने सोचा कि संत ने जो बोला है वो ही वचन हैं, वह उसकी भक्ति करने लगा।

एक बार वो रूटीन में हर रोज की तरह रात को सुमिरन पर बैठा था। इतने में कहीं से चोर आ रहे थे। उस जमींदार का घर गांव के बाहर की तरफ था, चोरों ने सोचा कि यहां से अच्छा माल मिलेगा, इधर भी हाथ साफ करते जाएं। एक चोर कहने लगा अपने साथी को कि पहले तू अन्दर जा मैं फिर आऊंगा।

उसने दीवार पर हाथ रखकर जैसे ही अंदर को छलांग लगाई उधर से जमींदार का वो पहला वचन जिसका वह जाप कर रहा था, आया, आओ जी, कैसे आए? चोर ने सोचा, हमें यह जाट, ‘जी’ कैसे कह रहा है। यह तो हो नहीं सकता! किसी और को कह रहा होगा। चोर ने इधर-उधर देखा। इतने में जमींदार ने संतों का दूसरा वचन दोहराया, इधर-उधर क्या देखते हो? चोर ने सोचा जाट बड़ा चालाक है। यह जरूर हमें दगा देगा।

चोर घूम कर अभी वापस कूदने की सोच ही रहा था कि जमींदार ने संतों का तीसरा वचन दोहराया, चल दिए! चोर ने सोचा कि यह मारेगा, छोड़ेगा नहीं और भाग गया।

पूज्य गुरु जी ने फरमाया, तो भाई! उस भोले इन्सान को पता नहीं था, पर फिर भी उसने संतों के वचनों को सुना और अमल किया तो उसका घर लुटने से बच गया।

इस प्रकार संत जो भी वचन करते हैं इन्सान उनको ध्यान से सुने और उन पर अमल करे तो पता नहीं क्या कुछ हासिल हो सकता है। संतों का हर कर्म इन्सान की भलाई के लिए ही होता है। वो जीवों को समझातें जगाते हैं। ये हम जीवों पर निर्भर है कि हम कितना लाभ उठा सकते हैं। बिना किंतु-परन्तु के उस जमींदार भाई की तरह भोले-भाले जीव, संतों के वचनों को मानने वाला तमाम रहमतों को पा जाता है।

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