Satguru helped his disciple and his father

सत्संगियों के अनुभव
पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपार रहमत
सतगुरु जी ने अपने शिष्य व उसके पिता की मदद की Satguru helped his disciple and his father

प्रेमी तरसेम सिंह इन्सां पुत्र सचखण्ड वासी किशन सिंह गाँव भलूर जिला मोगा हाल आबाद सुखचैन बस्ती शाह सतनाम पुरा सरसा (हरियाणा)।

सन् 1982 की बात है। सर्दी की शुरुआत थी। मैं अपने सतगुरु परम पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया मेहर से डेरा सच्चा सौदा बरनावा (उत्तर प्रदेश) में सेवा करने गया हुआ था। हम कई मिस्त्री आश्रम के नए बने कमरों की जोडियाँ बनाने की सेवा कर रहे थे। सुबह के समय परम पिता जी गुफा(तेरावास) से सीधे हमारे पास आ गए। पूज्य पिता जी ने और किसी मिस्त्री से कोई बात नहीं की। मेरे पास आते ही फरमाया,‘तरसेम बेटा! तूं घर चला जा, तैनूं छुट्टी है भाई।’ मैं गुनाहगार मालिक सतगुरु की रमजों को क्या जानता था कि मेरे बापू(पिता) जी का मोगा में एक्सीडैंट हो गया है। मैंने कहा कि पिता जी! अगर मैं घर चला गया तो हमारे घर वाले मेरा विवाह कर देंगे।

मैं डेरे में रहकर सेवा ही करना चाहता हूँ। इसलिए मेरा घर जाने को दिल नहीं करता। तो पूजनीय परम पिता जी यह कह कर चले गए कि ‘देख लै भाई।’ जो काम हमने सवा महीने का बकाया समझा था, पिता जी ने हमसे एक हफ्ते में करवा कर हमें छुट्टी कर दी तथा मुझे दिल्ली तक अपने साथ ही ले आए। सुबह के चार बजे थे। सेवा समिति वालों ने मुझे एक चौरास्ते(चौक) में उतार दिया। केवल उस चौरास्ते में ही रौशनी थी बाकी चारों तरफ अन्धेरा था। पिता जी ने गाड़ी रोक कर इशारे से मुझे अपने पास बुलाया व कहा, ‘बेटा, तैनूं पता है, हुण किद्धर जाणा है?’ मुझसे यह भी न बोला गया कि पिता जी, आप जी की मेहर से चला आऊँगा।

फिर पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘चंगा बेटा! थ्री व्हीलर आवेगा, उस ऊपर चढ जावीं।’ दो-तीन मिंटों के बाद थ्री व्हीलर आया, मैं उस पर चढ कर बस स्टैंड से रिक्शा लेकर रेलवे स्टेशन पहुँच गया। भटिंडा की तरफ गाड़ी 6:20 पर चलनी थी। सुबह के पाँच बजे थे। टिकट खिड़की अभी बंद थी। मैं पहली दफा दिल्ली गया था। मैं आगे स्टेशन देखने चला गया। जब मैं वापिस आया तो चैकर टिकटें चैक कर रहे थे। उन्होंने कुछ बगैर टिकट वाले लोग बिठा भी रखे थे। जब मैं वहां से निकलने लगा तो मुझसे भी टिकट मांगी। मैंने कहा कि मंै तो डेरा सच्चा सौदा बरनावा से आया हूँ। उन्होंने मुझे भी बगैर टिकट वालों में बिठा लिया। मैं घबरा गया कि अपने तो वैसे ही फंस गए।

अब यहां से कौन निकालेगा? यहाँ कोई जान पहचान भी नहीं। उसी समय रेलवे ड्रैस में एक आदमी मेरे सामने आया। उसने मेरी दार्इं बाजू पकड़ कर ऊपर की तरफ इशारा किया। मैं खड़ा हो गया। वह मुझे चैकर के पास ले जाकर कहने लगा कि यह तो मेरे साथ बम्बे वाली ट्रेन से आया है। इसकी जेब कट गई। तो चैॅकर कहने लगा कि जाओ! वह मेरी बाजू पकड़े-पकड़ाए बाहर आ गया तथा कहने लगा कि कहाँ जाना है? मैंने कहा, भटिंडा जाना है वह मुझे भटिंडा वाली टिकट खिड़की के पास लेजा कर कहने लगा कि टिकट यहाँ से मिलेगी। मेरे मन में ख्याल आया कि मुझे दिल्ली में कोई जानता नहीं, यह आदमी मुझसे चाय-पानी माँगेगा। मैंने कहा कि मैं पेशाब कर आऊँ।

मेरे पैर उठाने की देर थी कि वह अजनबी अदृश्य हो गया। मेरी हैरानी व खुशी की कोई सीमा न रही। फिर मुझे ख्याल आया कि यह तो मेरे सतगुरु परम पिता जी थे जिन्होंने यहाँ पर भी मेरी लाज रखी। मैंने सुना था कि सतगुरु अपने शिष्य की इस तरह संभाल करता है जैसे छोटे बच्चे की माँ। यह बात मैंने आज देख ली थी। मैंने अपने सतगुरु पूजनीय परम पिता जी का लाख-लाख धन्यवाद किया। जब मैं घर पहुंचा तो मुझे पता चला कि मेरे बापू जी का एक्सीडैन्ट हो गया था जो कि घट-घट व पट-पट की जानने वाले पूजनीय परम पिता जी ने उसी दिन ही मुझे बरनावा (उत्तर प्रदेश) दरबार से घर जाने की आज्ञा दे दी थी। मेरे बापू जी 65-70 वर्ष आयु के थे जिनका चूकणा (कुल्हा) टूट गया था। इस आयु में चूकणा बंधना बहुत मुश्किल था। परन्तु परम पिता जी की दया-दृष्टि तो एक्सीडैन्ट होने के तुरन्त बाद हो गई थी।

जब मुझे घर जाने की आज्ञा
दी थी। पूजनीय परम पिता जी की दया-मेहर से मेरे बापू जी बहुत जल्दी ठीक हो गए थे। बाद में भी वह एक नौजवान आदमी की तरह काम कर सकते थे व करते रहे थे। कोई नहीं कह सकता था कि उनका कभी चूकणा टूटा होगा। मैं अपने सतगुरु परम पिता जी के परोपकारों का बदला नहीं चुका सकता। मेरी परम पूजनीय परम पिता जी के प्रकट स्वरूप परम पूजनीय संत डा. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के चरणों में यही विनती है कि मेरी ओड़ अपने पवित्र चरणों में निभा देना जी।

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