Raise children in a good environment - Sachi Shiksha

कहते हैं कि बच्चे मन के सच्चे होते हैं अर्थात उनके मन में जो भाव आता है वे वैसा ही बर्ताव करते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार यदि माता-पिता उन पर हर वक्त पाबंदी या टीका-टिप्पणी करने लगते हैं तो बच्चे बहुत दब्बू या फिर बेहद शरारती बन जाते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी लाडली या लाडला जीवन के हर क्षेत्र में आगे रहें तो समय-समय पर आपको उसकी सहायता करनी होगी।

Tips for bringing up children in a good environment - Sachi Shikshaअगर अलग-अलग लोगों से इस पर राय ली जाए कि बच्चे सबसे ज्यादा खुश कब होते हैं तो सबका जवाब अलग होगा। कोई कहेगा कि ढेर सारे खिलौनों से बच्चे प्रसन्न होते हैं, तो कोई कहेगा कि नए कपड़ों से। शायद ही कोई यह कहेगा कि बच्चे सबसे ज्यादा खुश होते है परिवार के अच्छे माहौल से एवं प्यार से।

यदि परिवार का माहौल अच्छा होगा तो बच्चे न सिर्फ प्रसन्न रहेंगे बल्कि आगे चलकर जिम्मेदार नागरिक भी बनेंगे। यह आपकी जिम्मेदारी है कि बच्चे को समझदार बनाने में उसकी सहायता करें तथा उनसे दोस्त जैसा बनकर व्यवहार करें।
आज के बच्चों का दिमाग पूर्व की अपेक्षा बहुत तेज काम करता है। वे बगैर कुछ सोचे-समझे जो मन में आता है, बोल देते हैं। यदि आपका बच्चा भी ऐसा ही कुछ करता है तो उस पर निगाह रखें और बाद में उसे समझाएं।

उसी समय उसे डांटना ठीक नहीं हैं। इससे उसके उपर अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

  • बच्चा यदि बाल सुलभ शरारतें करता है तो उसे डाटें-फटकारें नहीं। याद कीजिए जरा अपने बचपन को, आप कितनी शरारतें करते थे। यदि आप बात-बात पर टोकेंगे तो बच्चा और शरारत करेगा। तथा आपकी बातों को वह अनदेखा भी करेगा एवं आपके प्रति उसकी नफरत भी बढ़ेंगी।
  • कहते हैं कि बच्चे सबसे अच्छे फेस रीडर होते हैं। जैसा आप बच्चे से व्यवहार करेंगे, वैसा ही वे बर्ताव करेंगे। यदि आप हमेशा झल्लाकर बोलेंगे तो बच्चे भी झल्लाकर ही उत्तर देगे। इसलिए मधुरवाणी का प्रयोग करें।
  • यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा शिष्टाचार व अच्छे तौर-तरीकों पर अमल करे तो आपको पहले स्वयं इनका पालन करना होगा। आपको बच्चों का रोल मॉडल बनना होगा।
  • आपका लाइफ स्टाइल कैसा भी हो, बच्चों के साथ थोड़ा समय अवश्य बिताएं। पिछले वर्षों में हुए अध्ययनों से पता चला है कि यदि माता-पिता के साथ बच्चे की संवाद प्रक्रि या बाधित हो जाती है तो बच्चे ज्यादा शरारतें करने लगते हैं।
  • बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए जरूरी है कि यह मत करो, वह मत करो के स्थान पर उस कार्य से होने वाले नुकसान को बताया जाए। बच्चे को बच्चा ही रहने दें। उससे यह अपेक्षा मत करें कि वह एक-दो दिन में आप जितना समझदार हो जाएगा।
  • बच्चों को कभी यह न महसूस होने दें कि आप उन्हें उपेक्षित कर रहे हैं। यदि बच्चों के मन में यह बात घर कर जाती है तो वे हीनभावना से ग्रस्त हो सकते हैं तथा भटकाव का रास्ता पकड़ सकते हैं।
  • बच्चे अपने आसपास की गतिविधियों और क्रि या कलापों का गंभीरता से अध्ययन करते हैं। इसलिए आप अपनी गतिविधियों में स्वयं सुधार करें।
  • बच्चों के खाने-पीने में अपनी जिज्ञासा मत थोपें। उससे उनकी रूचि में बदलाव आ सकता है।
  • बच्चों को खेलने-कूदने से मना मत करें। उनसे उनका शारीरिक विकास अवरुद्ध हो सकता है।
  • बच्चों की हल्की शरारत पर गंभीरता से ध्यान मत दें। इससे बच्चे और बिगड़ जाते हैं।
  • बच्चों से उनके होमवर्क एवं उनकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में अवश्य बात करें तथा समय-समय पर उनकी मदद अवश्य करें।
  • बच्चों के साथ दोस्त बनकर रहें। तभी वे आपको अपनी समस्या बता सकते हैं तथा आप उनकी मदद कर अच्छे नागरिक बन सकते हैं।

-नर्मदेश्वर प्रसाद चौधरी

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