One is named Gurwinder, the other is named Gurbakhsh

सत्संगियों के अनुभव
एक का नाम गुरविंदर, दूसरे का नाम गुरबख्श रखना

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपार रहमत
प्रेमी तरसेम सिंह इन्सां पुत्र सचखंडवासी किशन सिंह, निवासी गांव भलूर, जिला मोगा (पंजाब)। हाल आबाद सुखचैन बस्ती, शाह सतनाम जी पुरा, जिला सरसा (हरियाणा)। प्रेमी अपने पर हुई कुल मालिक की अपार रहमत का ब्यान करता है- सन् 1987 की बात है। मेरे बापू स. किशन सिंह बीमार हो गए थे। उनके बचने की कोई आशा नहीं थी। अंतिम समय जब मेरे बापू जी की रूह को लेने के लिए प्यारे सतगुरु परम पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज आए, तो मेरे बापू जी ने उनके आगे अर्ज की कि पिताजी, मैं तो पौत्रों के बिना ही जा रहा हूं। तो पूजनीय परमपिता जी ने उनको दो पौत्र दिखाए और आदेश दिया कि एक का नाम गुरविंदर और दूसरे का नाम गुरब ख्श रखना।

दोनों पौत्रों में से एक के बाल काले थे तथा दूसरे के भूरे। पूज्य पिताजी आशीर्वाद देकर चले गए। इसके उपरांत बापू जी बिल्कुल स्वस्थ हो गए। पूजनीय परमपिता जी ने मेरे बापू जी को जीवनदान दे दिया। सुबह उठते ही बापू जी ने हमारे परिवार में उक्त सारी कहानी बताई। उसी वर्ष हम दोनों भाइयों के घर एक-एक पुत्र ने जन्म लिया। पूजनीय परमपिता जी के आदेशानुसार मेरे भाई के लड़के का नाम गुरविंदर और मेरे लड़के का नाम गुरबख्श रखा गया। पूजनीय परमपिता जी द्वारा दिखाए अनुसार एक के बाल काले और दूसरे के भूरे थे। जनवरी 1989 में फिर से मेरे बापू जी का अंतिम समय आ गया। मेरे बापूजी रजाई में बैठे होते थे। हमारा पड़ोसी दलवारा सिंह हर रोज बातें करने के लिए उनके पास बैठ जाता था।

मेरे बापू जी दलवारा सिंह को कहने लगे कि मेरे गुरु पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज मेरा हिसाब-किताब करवा रहे हैं। दलवारा सिंह ने कहा कि चाचा जी, मैं तो तुम्हारे पास रोजाना ही बैठा रहता हूं, आपने तो कभी भी सिरदर्द की गोली भी नहीं ली है, और आप इस तरह की बातें करते हो! तो बापूजी कहने लगे कि मुझे तो कुछ नहीं हुआ। मैं तो बिल्कुल स्वस्थ हूं। दलवारा सिंह ने मेरी मां को आवाज लगाई, चाची, इधर आओ! मेरी मां आई, तो दलवारा सिंह कहने लगा कि चाचा इस तरह की बातें करता है कि गुरुजी मेरा हिसाब-किताब करवा रहे हैं। तो मेरी मां ने कहा कि रहता कितना-कु है? तो मेरे बापू जी कहने लगे कि मुझे कोई नहीं बुला रहा।

िपता जी आप ही करवा रहे हैं। तो दलवारा सिंह ने कहा कि तो फिर मेरी चाची क्या करेगी? मेरे बापू ने कहा कि गुरु-गुरु करे। उस समय मैं सरदूलगढ़ में काम करता था और परिवार समेत वहीं रहता था। मेरी मां ने कार द्वारा संदेश भेज कर मुझे घर बुलाया। मेरे घर पहुंचने से पहले ही मेरी मां ने मेरे भाई के पुत्र को बापू जी की छाती पर बिठा दिया और कह दिया कि गुरबख्श (मेरा पुत्र गुरबख्श, जो 2 महीने का था) होणी आ गए हैं। बापूजी ने कहा कि अगर मैंने गुरबख्श को देखना होता तो पिताजी मुझे सपने में क्यों दिखाते?

हमारे घर पहुंचने से पहले बापू जी का ध्यान दुनिया से टूट चुका था। वह हमसे मेल-जोल नहीं कर सके। अंतिम समय उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई और पूरी तंदुरुस्ती से उन्होंने अपना शरीर छोड़ दिया। यहां पर यह स्पष्ट किया जाता है कि अंत समय पूरे सतगुरु की रूह न तो कभी नर्कों में जाती है और न ही उसे यम लेने आते हैं, बल्कि अपनी रूह (नाम लेवा जीव) को सतगुरु खुद लेने आता है तथा उसकी पूरी-पूरी संभाल करता है।

पूरे सतगुरु का ऐसा जीव अपने जिस्म को ऐसे छोड़ देता है, जैसे कि कोई व्यक्ति अपने शरीर से पुराना कपड़ा उतरता है, जैसा कि उपरोक्त करिश्मे में स्पष्ट है। पूजनीय सतगुरु जी के प्रति हमारा विश्वास कभी भी डगमगाए नहीं। अपनी अपार रहमत इसी प्रकार बनाए रखना जी।

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