Life is all about managing situations and circumstances - Sachi Shiksha

जीवन है तो नित्य नए अवसर, नई चुनौतियां भी होंगी ही। जरूरी नहीं परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुकूल ही हों। किसी के पिताश्री बहुत अनुशासनप्रिय हैं तो कहीं विद्यालय में शिक्षक महोदय बिना दंड के बात ही न करने वाले। अक्सर कार्यालय में सख्त बॉस तो सबको मिलता है। जब मुखिया का व्यवहार कठोर हो अर्थात् हमारी बर्दाश्त सीमा के बढ़कर हो तो क्या हम बेहतरी की आशा को पनपने ही न दें?

नहीं, प्रतिकूल वातावरण का अर्थ है, हमें और अधिक सतर्क और सचेत रहना पड़ेगा। अपनी इच्छा के विपरीत जाकर भी अपने व्यवहार में वे गुण विकसित करने पड़ेंगे जो दूसरों को हमारे कार्य से शिकायत के कम से कम अवसर प्रदान करें। इसके लिए हमें स्वयं को प्रशंसा अथवा निंदा से निरपेक्ष होकर ईमानदारी से अपने कर्तव्य पालन का अभ्यास बनाना पड़ेगा। हमारे जीवन में जितनी भी अधिक समस्याएं आती हैं उन्हें समझाने की प्रक्रि या में हम उतना ही अधिक सीखते हैं और आगे बढ़ने के हमारे अवसर और अधिक बढ़ते हैं।

हर चुनौती हमारे अनुमान, हमारी क्षमता और उस अवसर विशेष पर हमारी प्रतिक्रि या के अनुरूप ही हो अथवा परिणाम हमारी अपेक्षा के अनुरूप ही हो। वास्तव में प्रतिकूलताएं जीवन को निखारती है। जिसे परिस्थितियों से जूझने से भय लगता है वह अपनी पहचान खोकर अपने भविष्य को अपने ही हाथों नष्ट करता है लेकिन जो प्रतिकूल परिस्थितियों का स्वागत करता है उसे हर बार बहुमूल्य अनुभव मिलता है जो प्रतिकूलताओं को लगातार सरल बनाकर सफलता को उसके निकट लाता है।

विषम परिस्थितियों से जूझने के लिए आत्मविश्वास का बहुत महत्व होता है। आत्मविश्वास से धैर्य उत्पन्न होता है,जो सफल होने के संकल्प को प्रबल बनाता है। एक योग्य व्यक्ति जहां भी नौकरी के लिए जाता, कोई भाव न देता। एक दिन मन में विचार आया कि ‘योग्यता होते हुए भी सफलता नहीं मिल रही तो जरूर कुछ ऐसा है जो मुझ में नहीं। शायद मेरा प्रस्तुतीकरण अथवा बात करने का ढंग गरिमा के अनुरूप न हो।’ उसने स्वयं को और बेहतर बनाने का प्रयास किया। अगले ही इन्टरव्यू में उसे सफलता मिल गई। एक दिन ऐसा भी आया जब उसे ‘रिजेक्ट’ करने वाले उससे निकटता चाहने लगे।

स्वयं को संयमित रखते हुए ही हम सशक्त टीम से भी जीत सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले अपने भाग्य को सराहो कि आपका प्रतिद्वंद्वी मजबूत है। हार-जीत की परवाह किये बिना अपना श्रेष्ठ करने का प्रयास करें। जरूर कुछ असाधारण होगा। अगर आपको लगता है कि इस समस्या का कोई समाधान हो ही नहीं सकता तो इसका केवल एक ही अर्थ है, ‘आपका प्रशिक्षण कमजोर है। अनुभवहीनता है। चुनौतियों से पार पाने का संकल्प हिला हुआ है।’ स्मरण रहे, कठिनाइयों और बाधाओं का उद्देश्य आपकोे नष्ट करना नहीं बल्कि सुदृृढ़ करना है। वह आपके उस कौशल को प्रकट करने में मदद करती जो सामान्य अवस्था में शायद सुषुप्त, निष्क्रि य ही रह जाता।

यदि जीवन में चुनौतियां अधिक हैं तो स्वयं पर गर्व करना चाहिए क्योंकि बड़े लक्ष्य साधारण योद्धा को नहीं दिए जाते। कठिन चुनौती का अर्थ है परिस्थितियां हमें निखारने, संवारने के लिए प्रशिक्षण देना चाहती हैं ताकि हम बड़ी भूमिका के सुपात्र बन सकें। आखिर साधारण सैनिक और कमांडो के प्रशिक्षण में अंतर तो होता ही है। जिंदगी है तो धूप-छांव भी रहेगी। फूल संग कांटे का होना फूल की सुगंध को प्रभावित नहीं कर सकता पर हां, अवसर पड़ने पर उसकी सुरक्षा जरूर करता है। पग-पग चिंतित दुखी होने की बजाय कठिन परिश्रम से प्राप्त सफलता के आनंद की कल्पना करो। जीवन को अपने ढंग से जीने की इच्छा सबकी होती है। अनेक सुनहरे ख्वाब होते हैं। अन्तहीन गगन में उड़ने की चाह जीजिविषा है। मानवीय स्वभाव है लेकिन कई बार परिस्थितियां अपने पंख समेटने को विवश कर देती हैं।

मन ही मन दुखी अथवा तनावग्रस्त होने की बजाए गीले नारियल से कुछ सीखने का प्रयास करो जो अपने पानी को अंदर-अंदर सोख लेता है और सूखा गोला बनकर नारियल के मजबूत खोल में सुरक्षित रहता है। संयमपूर्वक परिस्थितियों से जूझते हुए जब आप सबके समक्ष आते हैं तो आपकी बहुपयोगिता होती है, क्योंकि सूखे गोले की तरह आप में भी ‘स्रेह’ प्रकट हो जाता है जो आपको अधिकतम स्वीकार्य बनाता है। पुरुषार्थहीन नहीं, पुरुषार्थी बनना है।

विद्यार्थी तो सदैव रहना ही है। कर्म से भागना नहीं, गलती सुधारने में देरी नहीं करना, दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या नहीं करनी। आलस्य और अज्ञान से नाता नहीं रखना।’ इसको अपने मन-मस्तिष्क में स्थापित करना मानवता है। परिस्थितियों से जूझने से इंकार करने वाले कर्महीन भाग्य को कोस कर अपना पाप छिपाने का प्रयास करते हैं। ऐसे निराश और निरुत्साही सफलता के स्वाद से वंचित रहते हैं।
-डा. विनोद बब्बर

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