उंगलियों से उकेरता है हूबहू

उंगलियों से उकेरता है हूबहू
उसकी उंगलियों में इतनी जादूगरी छिपी है कि बस एक बार किसी को गौर से निहार लिया तो वे थिरकनें लगती हैं। इन उंगलियों में ब्रुश आते ही जहन में बसी वही तस्वीर हू-ब-हू कॉटन के कपड़े पर उकरने लगती है।

तस्वीर भी ऐसी कि जैसे मुंह से बोलेगी। डिजिटल जमाने में उंगलियों का ऐसा हुनर देखकर हर कोई हैरान हो उठता है। हाथ का यह फनकार है सिरसा शहर के खैरपुर निवासी रविंद्र गिल, यह एक साधारण परिवार में पैदा हुआ है। अपनी मेहनत के बलबूते परिवार का गुजर बसर करने वाला रविंद्र चित्रकारी का शौक बचपन से ही मन में पाले हुए है। रविंद्र के घरवाले बताते हैं कि जब वह 5 साल का था, तब वह दीवारों पर बु्रश से कुछ बनाने का प्रयास करता था, घर की सभी दीवारें बचपन के दिनों में उसकी अभुज चित्रकारी से लैस रहती थी। ज्यों-ज्यों उम्र का तकाजा बढ़ता गया, रविंद्र की उंगलियों ने एक लय और लयाकत का रूप धारण कर लिया।

बचपन के दिनों में रविंद्र दीवार पर पेड़-पौधों के चित्र बनाने का शौक रखता था। बेटे की चित्रकारी के प्रति दिलचस्पी को देखकर पिता मंगा सिंह गिल ने मजााकिया लहजे में बोला, ‘तू बन जा पेंटर’। चित्रकारी की लगन नेरविंद्र को ऐलनाबाद निवासी श्रीराम पेंटर के पास जाने को विवश कर दिया। पेड़-पौधों से शुरू की गई रविंद्र गिल की चित्रकारी आज एक ऐसे मुकाम पर है, जिसका कोई सानी नहीं है। ये बात और है  कि अभी तक रविंद्र गिल की चित्रकारी को जो मुकाम मिलना चाहिए था, वो नहीं मिल पाया। रविंद्र का कहना है कि भले ही उसकी कला को अभी असली मुकाम नहीं मिला है, लेकिन उसे उम्मीद है कि एक दिन अवश्य उसकी कला को नई पहचान मिलेगी और उसका भी नाम होगा।

आर्थिक स्थिति बनी बाधा:

रविंद्र गिल का जुड़ाव एक साधारण परिवार से है। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं, जिसके चलते उसे चित्रकारी जैसे शौक को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। यही वजह है कि वह 5वीं कक्षा तक ही पढ़ाई कर पाया। परिवार के पालन-पोषण के लिए उसने शुरू में डबवाली रोड पर एक मोबाइल शॉप पर लेमिनेशन का काम
करना शुरू किया।

मोबाइल लेमिनेशन के साथ-साथ चित्रकारी के कार्य को भी रविंद्र ने जब भी वक्त मिला, बदस्तूर जारी रखा। अब रविंद्र ने सिरसा शहर के डबवाली रोड पर रॉयल आॅर्ट के नाम से शॉप की है, जहां वह मोबाइल लेमिनेशन का कार्य करने के साथ-साथ अपनी चित्रकारी को भी अधिक निखार देने का प्रयास कर रहा है। कॉटन के कपड़े व आॅयल पेंट का होता है प्रयोग: रविंद्र गिल ने बताया कि शुरूआत में वह कागजों पर पेंटिंग बनाता था। लेकिन धीरे-धीरे आॅयल पेंटिंग का शौक जागा। चित्र बनाने के लिए शुरू में वह केनवास से कॉटन कपड़े पर पेंसिल से खाली खाका तैयार करता है। आॅयल पेंटिंग के लिए केनवास व कॉटन कपड़े की जरूरत होती है।

आॅयल कलर से तस्वीर के मुताबिक रंगों का इस्तेमाल करता है। रविंद्र का कहना है कि कोई पिक्चर या तस्वीर एक बार देखने के बाद वह हू-ब-हू उसकी आकृति अपने हुनर के बूते उकेर देता है। एक चित्र को तैयार करने पर करीब 3 से 4 हजार रुपए का खर्च हो जाता है।

अब तक बना चुका है तीन हजार पेंटिंग:

41 वर्षीय रविंद्र गिल ने बताया कि करीब 15 सालों के सफर के दौरान वह अब तक करीब तीन हजार चित्र बना चुका है।

वह दिन में मोबाइल लेमिनेशन का काम करता और सुबह-सायं दो-दो घंटे चित्रकारी में लगाता है। रविंद्र ने बताया कि यूं तो उसने हजारों फोटो बनाई है, लेकिन उनमें कुछ खास भी रही हैं। एक खास  पेंटिंग का जिक्र करते हुए उसने बताया कि कुछ समय पूर्व उसके पास सिरसा का ही एक युवक अपनी भाभी की फोटो बनवाने के लिए आया था, जोकि विदेश में रहती थी। भले ही इस फोटो के लिए उसे कुछ नहीं मिला हो,  लेकिन युवक ने जब वह फोटो अपनी भाभी को विदेश में भेजी तो उन्होंने खुश होते हुए अपने देवर को एंड्रायड मोबाइल गिफ्ट किया।

चित्रकारी को मुकाम की दरकार:

चित्रकारी के सफर में रविंद्र ने बेशक अपने हाथों से 3 हजार से अधिक चित्र बनाए हैं, लेकिन अभी तक उसे चित्रकारी के इस हुनर के लिए कोई सम्मान नहीं मिला है। इसकी एक वजह यह भी रही कि जितने भी चित्र बनाए गए, वे सब व्यक्तिगत थे। हालांकि कुछ समय  पूर्व सिरसा के एसपी रहे हामिद अख्तर को उनकी तस्वीर बनाकर भेंट की थी, जिसके बदले उन्होंने प्रशंसा पत्र दिया था।  महेंद्र सुथार

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