बात नहीं संवाद हो

लफ्ज़ों का जादू हमेंशा असर करता है। बात कहने की बजाय संवाद करना सीखिए।
किसी ऐसे इंसान को याद कीजिये, जिसके साथ आपकी अच्छी जमती है और उसके साथ गुजारा समय आपको काफी आनंदित करता है। अब खुद को टटोलिये कि उस व्यक्ति विशेष का साथ आपको इतना अच्छा क्यों लगता है?
जवाब ढूंढने के लिए ज़रूर आप सामने वाले व्यक्ति की खूबियों पर गौर कर रहे होंगे। जैसे वह बहुत खुशमिज़ाज़ है, अच्छा मार्गदर्शक है आदि। लेकिन कुछ न कुछ खूबी तो सभी में होती है पर सभी के साथ हमारा एक समान रिश्ता तो कायम नहीं होता है न। कहने का तात्पर्य है कि सिर्फ एक ही चीज़ है जो हमें एक दूजे से जोड़ती है और वह है संवाद।

दोस्त तो बहुत सारे होते हैं, पर एकाध ही सबसे करीबी होता है। इसकी वजह आप बताएंगे- ‘‘खूब जमती है‘‘, और हम कहेंगे ‘‘जमती है बेहतरीन संवाद की वजह से‘‘। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जब दो लोग एक दूसरे से हर छोटी – मोटी ख्वाहिश से लेकर मन में छिपे गुबार तक, सब कुछ साझा करते हैं तो उनके बीच खुद ब खुद मज़बूत रिश्ता कायम हो जाता है। और जब कुशल संवाद से दो दिल के तार जुड़े हों तो कोई शक नहीं कि वे एक दूसरे को अच्छी तरह समझेंगे। आधुनिक व्यस्तता और अजनबियत का जामा पहनी इस दुनिया में एक ऐसा साथी मिले जो आपको समझता है, तो उसका भाना स्वाभाविक है।

कहना, सुनना और गुननाः

हमारे लिए यह समझना ज़रूरी है कि सिर्फ बोल देना संवाद नहीं है बल्कि कहने, सुनने और उसे गुनने यानि उस पर अमल करने व प्रतिक्रिया देने से ही संवाद सफल होता है। यह अदृश्य व गैर मौज़ूद इंसान से नहीं हो सकता। यह हो सकता है कि वह आपके सामने मौजूद न हो पर आप उससे टेलीफोन या अन्य तरीके से संवाद कर रहे हों। यदि संवाद करते समय आप एक दूसरे को देख पा रहे हों (वीडियो कॉल के जरिये हीद्ध, तो संवाद बेहतरीन हो सकता है। हालांकि संवाद में बोलने के साथ – साथ आँखों का अपना ही अलग महत्व है, पर यदि आप सिर्फ मोबाइल पर ही बात कर रहे हैं तो आपकी बातचीत एक मधुर संवाद बन सकती है और उसमें मधु घोल सकती है।

उल्टी दिशा के राही हैं हमः

आजकल के युवा फोन पर दूर बैठे व्यक्ति से जुड़ने के प्रयास में, पास बैठे अपनों से दूर हो रहे हैं। हमारा पड़ोसियों, सहकर्मियों और रिश्तेदारों से स्वस्थ संवाद नहीं होता। अपनी प्रजे़ंस भी हम एकतरफीय व्हाटस एप्प से दे रहे हैं, तो आपसी प्रेम, सौहार्द, और सहयोग की भावना भी नहीं पनपती। नतीजन हम एक दूसरे के लिए बेगाने होने लगे हैं।
कुशल संवाद के अभाव में हम खुद को अच्छी तरह व्यक्त नहीं कर पाते। गलतफहमिया व गलत धारणा इसका नतीजा बन जाती हैं।

१. क्या कहते हैं और किस लहज़े में कहते है, यही गुण हमारी छवि बनाता व बिगाड़ता है।
२. योग्य व जानकार होने के बाबज़ूद कई लोग सिर्फ इसलिए पिछड़ जाते हैं क्योंकि वे अभिव्यक्ति का सही तरीका नहीं अपनाते।
३. संवादहीनता के चलते भीड़ में अकेला होने की भावना तेजी से अपनी जड़ें फैला रहीं है। हद तो यह है कि एक दूसरे को देखकर अभिवादन करने और खैरियत पूछने तक का सदाचार हम भूलने लगे हैं।

साकार हो संवादः प्रभावपूर्ण या कुशल संवाद न करने के नुकसान सहने से बेहतर है, इस कला को सीख लिया जाए।

कुछ तरकीबें काम आएँगीः-

सामने कौन है- किस तरह बात रखी जाए यह निर्धारित करने के लिए सामने वाले व्यक्ति के मानसिक स्तर, पसंद – नापसंद और समझ पर गौर करें। उदहारण के लिए एक ही बात बच्चे को और एक टीनेजर को अलग – अलग तरीके से समझाने की ज़रूरत होगी।

सीधे सादे बोल-

पूरे आत्मविश्वास के साथ और आत्मीयता के साथ बेहद साधारण तरीके से अपनी बात करें।
आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए- आईने के सामने अपनी बात रखने का अभ्यास करें।

यह तरीका ऑफिस में सेमीनार देने, लेक्चर देने व किसी खास के सामने अपनी बात को रखने में खास कारगार होता है।

डायरी राइटिंग थेरेपी-

दिन भर की बातों को डायरी में लिखें। इससे अभिव्यक्ति की क्षमता दिन पर दिन निखरेगी।

खूब पढ़ें-

पढ़कर, सुनकर हम कई बातों को अपने अंदर समाहित करते हैं। यही बातें हमारी अभिव्यक्ति में झलकती हैं। इसलिए साहित्य और ज्ञान देने वाली किताबें पढ़ें, इससे भाषा और बौद्धिक स्तर दोनों में सुधार होगा।

अनुभवों का सहारा-

प्रभावपूर्ण किस्से या जीवन के अनुभवों के माध्यमों से कही गयी बातें लोगों पर गहरा असर डालती है। चाहे तो बात का वजन बढ़ाने के लिए इनका सहारा ले सकते हैं।

जिस तरह एक पौधे को पल्ल्वित होने के लिए खाद पानी आदि चाहिए, उसी तरह रिश्तों को फलने – फूलने के लिए स्वस्थ संवाद की ज़रूरत होती है। याद रखें, ‘‘क्वांटिटी टाइम की बजाय क्वालिटी टाइम‘‘ ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इसलिए आत्मीयता की भावना में डूबे क्षणिक संवाद ही हमारे तार आपस में जोड़ेगें।

मधु सिधवानी

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