Safalta Ki Kunji - Sachi Shiksha

हम सब जिंदगी में कुछ न कुछ पाना चाहते हैं। उसे पाने के लिए मेहनत भी करते हैं पर कभी कभी, हमारे सामने ऐसी चुनौतियां आ जाती हैं जो हमें आगे बढ़ने से रोकती हैं।

धीरे धीरे हम महसूस करने लगते हैं कि कठिनाइयां हमसे ज्यादा शक्तिशाली हैं, हम उन्हें नहीं हरा पाएंगे। हमें लगता है कि हम उस चीज को हासिल नहीं कर पाएंगे जिसे पाने के लिए हम मेहनत कर रहे हैं और हम हार मान लेते हैं।

अगर तमाम कोशिशों के बावजूद भी सफलता आपके हाथ नहीं आ रही, तो आपको जरूरत है स्वयं में कुछ बदलाव लाने की। जब तक हम हर कार्य को कला का रूप नहीं देंगे, जिंदगी में कभी सफल नहीं हो सकते।

अलग ढंग से काम करने वाले हाथ, दिमाग और दिल, तीनों का इस्तेमाल बखूबी ढंग से करते हैं। मंजिल पाने के लिए इंसान को सच्चा और ईमानदार होना बेहद जरूरी है। जब तक हम खुद के प्रति ईमानदार और सच्चे नहीं होंगे, तब तक दूसरे के प्रति वफादार नहीं हो सकते। इसलिए जीवन में कोई भी संकल्प लेने से पहले यह जरूर विचार कर लें कि‘मैं इस संकल्प में अपना 200 प्रतिशत न्यौछावर करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ या नहीं।’

क्योंकि जो लोग कोशिश करने की बात करते हैं, वो हमेशाअसफलता को गले लगाते हैं। ध्यान रखें कि संकल्प करने के बाद जो व्यक्ति रास्ते में आने वाली सभी चुनौतियों का जवाब देकर आगे बढ़ना जारी रखता है, वही जीतता है।

आपको एक कहानी के माध्यम से आपकी आँखों को खोलने का प्रयास करता हूँ

एक दिलचस्प कहानी है कि एक बार एक राजा बहुत बीमार हो गया। बहुत से वैद्यों को दिखाया पर किसी को उस का रोग समझ नहीं आया। फिर एक वैद्य ने सलाह दी कि राजा उसी सूरत में ठीक हो सकता है अगर वह सिर्फ हरा रंग ही देखे। राजा ने हर चीज हरी करवा दी। महल के रंग से ले कर कपड़े, यहां तक कि खाना भी हरे रंग का ही खाने लगा । एक बार एक साधु वहां से गुजरा और हर ओर हरे रंग का आधिपत्य देख उस ने लोगों से इस का कारण पूछा तो राजा की बीमारी के बारे में उसे पता लगा।

यह जान वह राजा के पास गया और बोला, ‘महाराज, आप किसकिस चीज को हरे रंग में बदलेंगे? हर चीज को बदलना संभव नहीं है। इस से बेहतर होगा कि आप हरा चश्मा पहन लें, फिर आप को हर चीज हरी ही नजर आएगी।’

प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का स्वयं वास्तुशिल्पी होता है। वह जैसा चाहता है वैसा ही उस का निर्माण करता है। हालांकि निर्मित करने के बाद कई बार उसे एहसास होता है कि जो उस ने निर्मित किया है वह उसे पसंद नहीं आया है और उस में बदलाव करने के बजाय दूसरों को इस का दोषी ठहराने लगता है।

वास्तव में तब तक कुछ नहीं बदलता जब तक कि हम खुद को नहीं बदलते। जिंदगी को देखने का चश्मा ही अगर गलत पहना हो तो खूबसूरत रंग बदरंग लगने स्वाभाविक हैं। फूलों की छुअन में कांटों की चुभन का एहसास होना स्वाभाविक है।कहने का मतलब है हरे पर दाग हों तो आईने का क्या कुसूर। आईने पर झुंझलाने या उसे साफ करने के बजाय हमें चेहरे यानी खुद पर ही ध्यान देना चाहिए।

जिंदगी का फलसफा भी कुछ ऐसा ही है।

जो भी काम हम करें, उसको सर्वोत्तम विधि से करें, यही हमारा संकल्प होना चाहिए। चाहे आप जो भी काम करें, उसमें एक जुनूनी ललक नजर आनी चाहिए। अपने से उच्च अपेक्षा रखें, जिसमें अपने सपनों को चरितार्थ करने के लिए भरपूर उमंग का भी साथ होना चाहिए पर स्वयं को बेहद दबाव में डालकर काम करना भी कोई अक्लमंदी नहीं है। यदि ऐसा होता है तो पता लगाएं कि क्या चीज आपको इतना तनाव या दबाव दे रही है। फिर उसको दूर करने या सुधारने का प्रयत्न करें। इसके लिए खास योजनाएं बनाएं और उसी के अनुसार काम भी करें।
-संजय कुमार सुमन

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