लोकतंत्र का उत्सव

लोकतंत्र का उत्सव देश में 10 मार्च से चुनावों की बिसात बिछ चुकी है। पूरा देश लोेकतंत्र के इस उत्सव में है, जिसमें हर नागरिक एक नई आशा, उम्मीद के साथ इस उत्सव में शरीक है। मुख्य चुनाव कमिशन सुनील अरोड़ा ने गत 10 मार्च को इस महान उत्सव का बिगुल बजाते हुए देश में चुनावी माहौल को सरगर्म कर दिया है, जो 11 अप्रैल से 23 मई तक देश-दुनिया के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र बना रहेगा।

इन चुनावों के परिणाम 23 मई को तय किए गए हैं, जिसका सबको बेसब्री से इंतजार रहेगा।

यह दिन इस महान उत्सव का अति विशेष दिन होगा, जिसमें जनता अपनी चुनी गई भावी सरकार से रूबरू होगी।

जैसा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सर्वेसर्वा मतदाता को ही माना गया है। देश की सुख-समृद्धि व उन्नति के लिए सरकार को चुनना मतदाता के अधिकार क्षेत्र मेें है। वह अपने बुद्धि-विवेक से अपने मत का उपयोग करते हैं। अपने भविष्य की तस्वीर को गढ़ता है। अपना देश विश्व में सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में जाना जाता है। जहां राज्यसभा व विधान परिषद को छोड़कर स्थानीय प्रतिनिधियों को जनता के द्वारा निष्पक्ष मतदान प्रणाली से चुना जाता है। देश में 17वीं लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं, जिसमें 90 करोड़ मतदाता अपने मत का उपयोग करेंगे। इस बार 8 करोड़ नए मतदाता भी हैं, जो पहली बार लोकतंत्र के इस उत्सव का हिस्सा बनने जा रहे हैं।

राजनीति के माहिरों का कथन है कि जब भारत में मतदान होता है तो मानो सम्पूर्ण विश्व मतदान कर रहा होता है। क्योंकि देश में 90 करोड़ मतदाताओं का आंकड़ा दुनिया के कई देशों की जनसंख्या के बराबर है। इस लिहाज से उपरोक्त कथन की पुष्टि भी होती है। लोकतंत्र के इस उत्सव में 90 करोड़ मतदाता मताधिकार का उपयोग करके देश की बागडोर किन हाथों में सौंप रहे हैं, यह 23 मई को स्पष्ट हो जाएगा। मगर इससे पहले चुनाव का यह दौर सुचारू रूप से सम्पन्न हो, यह अति जरूरी है।

यही कारण है कि चुनाव आयोग के द्वारा 7 चरणों में चुनाव कराए जाने का प्रोग्राम निर्धारित किया है, ताकि चुनाव शांतिपूर्वक सम्पन्न हों। क्योंकि देश भाषावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, अलगाववाद जैसी आंतरिक समस्याओं के अलावा उग्रवाद जैसी विराट समस्याओं से घिरा हुआ है। हाल ही के दिनों में हुए पुलवामा हमले की घटना से देश के इस चुनावी माहौल को शांति पूर्वक बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है।

इसके लिए जहां सरकारों के द्वारा चौकसी बरती जा रही है, वहीं प्रत्येक नागरिक को भी सजग, सतर्क रहना लाजिमी है। यह एक बाहरी समस्या है, जिससे निपटने के लिए समय रहते अहम कदम उठाने होंगे। वहीं लोकतंत्र की इस चुनावी व्यवस्था में जो आंतरिक समस्याएं हैं, उनकी ओर भी प्रत्येक को ध्यान देना होगा। चुनाव आयोग से लेकर उम्मीदवारों व मतदाताओं और आम जनता को भी चुनाव सुधार के लिए अपना सहयोग करना होगा। क्योंकि हर चुनाव में धनबल, बाहुबल का बोलबाला बढ़ता जा रहा है।

बेशक चुनाव आयोग हर बार नए नियम बना कर पूरी सख्ती बरत रहा है और राजनीतिक दलों की मनमर्जी पर अंकुश लगा रहा है। उसके बावजूद भी कहीं न कहीं ऐसी खामियां रह जाती हैं, जो इस उत्सव के रंग में भंग डाल देती हैं। क्योंकि देश में गरीबी, बेरोजगारी नशाखोरी का बोलबााल है और लोगों को पैसे या नशे का लालच दिखाकर प्रभावित करना आसान है और यह हर चुनाव की आम बात हो गई है।

उम्मीदवार के सामने सिर्फ अपनी जीत का लक्ष्य ही रहता है। इसके लिए वह हर प्रकार के तौर-तरीके अपनाने की कोशिश करता है। अधिकतर मतदाताओं की नब्ज टटोलकर ही ऐसा किया जाता है। जोकि देश के भविष्य के लिए खतरा है। पैसों या नशों को बंटवाकर वोट हासिल करने की योजनाओं का बनाना अपनी ही आने वाली पीढ़ी के लिए गड्ढा खोदने जैसा है। देश की युवा पीढ़ी को तबाह करने जैसा है, जो किसी उग्रवादी हमले से भी भयंकर है।

यह विनाशकारी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा होना लोकतंत्र का गला घोटने जैसा है। ऐसी आतंरिक समस्यओं को रोकना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। इन पर अंकुश लगाना जरूरी है। हमारे देश की संस्कृति विश्व में अव्वल है। हमारी राजनीतिक परम्पराएं सांस्कृतिक और धार्मिक मान-मार्यादाओं से युक्त हैं।

हम विश्व में प्राचीन वैदिक, पौराणिक व्यवस्थाओं वाले देश के वासी हैं। हमारे देश को विश्व गुरु के रूप में जाना जाता है, जिसकी राजनीति धर्म के अनुसार रही है। आज फिर इसकी जरूरत है।

अपनी उसी राजनीतिक धरोहर को पुनर्जीवित करना है, जहां हर धर्म की सांझी बात हो, प्रत्येक धर्म का सम्मान हो। सबको समान अवसर मिले। फिर ही देश सच में उन्नति की ओर बढ़ता है और सच्चा लोकतंत्र बनता है। – सम्पादक

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