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60वीं पावन स्मृति (18 अप्रैल) विशेष
याद-ए-मुर्शिद परम पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज
…सब भ्रम मुकावणआया सी
संत परोपकारी होते हैं। संसार में आने का उनका मकसद जीवों को जीआदान, नामदान, गुरुमंत्र देकर कुल मालिक परमपिता परमात्मा से मिलाने, जन्म-मरण से आजाद करवाने का होता है। यह जीव-सृष्टि का सौभाग्य है कि संत-महापुरुष हर युग में हमारे मध्य विराजमान रहते हैं। सृष्टि कभी भी संतों से खाली नहीं रहती। ‘संत न आते जगत में, तो जल मरता संसार’, सृष्टि संतों के आसरे ही कायम है।

महान परो पकारी संत-महापुरुषों का सृष्टि के नमित परोपकार केवल इस जगत तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि लोक-परलोक और उससे भी पार, दोनों जहां तक उनका नाता जीवों से होता है। सच्चे संत खुद सच्चाई से जुड़े रहते हैं और वे लोगों को भी हमेशा सद्मार्ग, अच्छाई, भलाई के साथ जोड़ते हैं, सच से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करते हैं। संत हमेशा समस्त समाज का भला चाहते हैं और अपने हर संभव यत्न द्वारासमाज का भला करते हैं। वे समाज में फैले झूठ, कपट, कुरीतियों, पाखंडों का डटकर विरोध करते हैं और अच्छे कार्यों को प्रोत्साहितकरते हैं।

उनका पवित्र जीवन पूरी दुनिया के लिए मिसाल साबित होता है।
ऐसे ही महान परोपकारी परम संत पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने संसार पर अवतरित होकर समूचे जीव-जगत के उद्धार का महान करम फरमाया। ऐसे महान परोपकारी, रूहानियत के सच्चे रहबर, पूर्ण रब्बी फकीर, परम संत बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज को कोटि-कोटि नमन, लख-लख सजदा करते हैं।

आदर्श जीवन परिचय:

साईं बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने सन् 1891 (संवत 1948) की कार्तिक पूर्णिमा को पूज्य पिता श्री पिल्लामल जी के घर पूज्य माता तुलसां बाई जी की पवित्र कोख से सृष्टि पर अवतार धारण किया। आप जी मौजूदा पाकिस्तान के गांव कोटड़ा, तहसील गंधेय, रियासत कलायत, बिलोचिस्तान के रहने वाले थे। पूज्य माता-पिता जी के यहां चार बेटियां ही थी। बेटे की ख्वाइश उन्हें हर पल बेचैन रखती थी। एक बार पूज्य माता-पिता जी का मिलाप एक सच्चे फकीर से हुआ। वह फकीर कोई करनी वाला (परमपिता परमेश्वर का सच्चा फरिश्ता) था।

उन्होंने फरमाया कि बेटा तो आपके यहां जन्म ले लेगा, लेकिन वह आपके काम नहीं आएगा। अगर ऐसा मंजूर है तो बोलो? पूज्य माता-पिता जी ने तुरंत अपनी सहमति दी कि हमें ऐसा ही मंजूर है। परमपिता परमेश्वर की दया और उस फकीर की दुआ से पूज्य माता-पिता जी को लगभग 18 साल के बाद पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी के रूप में पुत्र धन प्राप्त हुआ। आप जी खत्री वंश से संबंध रखते थे।

पूज्य माता-पिता जी ने आप जी का नामकरण श्री खेमामल जी के नाम से किया। लेकिन जब आप जी अपने सतगुरु हजूर बाबा सावण सिंह जी महाराज के पवित्र चरणों से जुड़े, तो पूज्य बाबा जी आप जी को मस्ताना शाह बिलोचिस्तानी ही कहा करते और इसीलिए आप जी मस्ताना बिलोचिस्तानी नाम से ही जाने जाते थे। आप जी ने अपने सतगुरु, मुर्शिद-ए-कामिल हजूर बाबा सावण सिंह जी महाराज को पहले दिन से ही परमपिता परमात्मा के रूप में निहारा था और हमेशा अपना खुदा और सब कुछ मानते थे।

सतगुरु प्यारे के प्रति आपजी की अगाध श्रद्धा, दृढ़ विश्वास, सच्ची भक्ति, सच्चे प्रेम को देखकर हजूर बाबा सावण शाह जी आप जी पर बहुत प्रसन्न व मेहरबान थे। पूज्य बाबा जी ने पहले ही दिन नाम शब्द, गुरुमंत्र के रूप में आपजी को अपनी अपार दया, मेहर प्रदान की। पूज्य बाबा जी ने वचन फरमाया कि हम तुझे अपनी दया-मेहर देते हैं, जो तुम्हारे सारे काम करेगी। डटकर भजन-सुमिरन और गुरु का यश करो।

आप जी ने अपने सतगुरु जी के हुक्म अनुसार सिंध, बिलोचिस्तान, पश्चिमी पंजाब आदि इलाकों में जगह-जगह सत्संग कर गुरु के यश गायन के द्वारा अनेक जीवों को ब्यास में ले जाकर अपने सतगुरु बाबा सावण सिंह जी महाराज से नाम शब्द, गुरुमंत्र दिलाकर उनकी आत्मा का उद्धार करवाया। आप जिसे भी नाम शब्द के लिए लेकर जाते, पूज्य बाबा जी उसे अवश्य नामदान बख्श देते। उसकी छंटनी नहीं होती थी। उपरांत पूज्य बाबा जी ने आप जी को अपनी अपार रहमतें, खुशियां, अपनी अपार बख्शिशें प्रदान करके और अपनी भरपूर रूहानी ताकत देकर सरसा में भेज दिया कि जा मस्ताना शाह, जा बागड़ को तार। तुझे बागड़ का बादशाह बनाया।

जा सरसा में कुटिया-आश्रम बना और सत्संग लगा। रूहों का उद्धार कर। आप जी के सहयोग के लिए पूज्य बाबा जी ने अपने कुछ सत्संगी सेवादारों, सरसा निवासियों की भी ड्यूटी लगाई। तो इस प्रकार अपने सतगुरु मुर्शिदे-कामिल के हुक्म अनुसार आप जी ने सरसा के नजदीक बेगू रोड (शाह सतनाम जी मार्ग) पर 29 अप्रैल 1948 को डेरा सच्चा सौदा शाह मस्ताना जी धाम की स्थापना की।

आप जी ने दिन-रात गुरुयश, रूहानी सत्संग लगाकर नाम शब्द, गुरुमंत्र देकर रूहों को भवसागर से पार लगाने का पुण्य कार्य आरंभ किया। जैसे-जैसे समय बीतता गया आज कुछ, कल कुछ और अगले दिन उससे भी बढ़कर लोग सच्चा सौदा में आने लगे और इस प्रकार आप जी की दया-मेहर,रहमत का प्रचार-प्रसार दूर-दूर तक फैलने लगा। आप जी के द्वारा लगाया सच्चा सौदा रूहानी बाग, राम नाम का बीज दिन-रात फलने-फूलने लगा। यह रूहानी बाग दिन-रात महकने लगा।

आप जी ने सन् 1948 से 1960 तक मात्र 12 सालों में हरियाणा, राजस्थान के अलावा पंजाब, दिल्ली आदि राज्यों के अनेक गांवों, शहरों, कस्बों में जगह-जगह अपने रूहानी सत्संगों के द्वारा हजारों लोगों को नाम शब्द, गुरुमंत्र देकर उन्हें नशों आदि बुराइयों तथा हर तरह के जंजालों, पाखंडों, कुरीतियों से मुक्त किया। ‘हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, सभी हैं भाई-भाई’ का प्रैक्टिकली स्वरूप आप जी द्वारा स्थापित सर्वधर्म संगम डेरा सच्चा सौदा में आज भी ज्यों का त्यों देखा जा सकता है।

कोई राम कहे या कोई अल्लाह, वाहेगुरु कहे या कोई गॉड, यहीं एक ही जगह पर इकट्ठे बैठकर सभी अपने-अपने धर्म व तरीके से उस परमपिता परमात्मा का नाम ले सकते हैं। कोई रोक-टोक नहीं, कोई धर्म-जात का अंतर नहीं किया जाता। सभी को बराबर सत्कार, बराबर सम्मान दिया जाता है। इस प्रकार समाज में जीवोद्धार का यह सच का कारवां दिन-दोगुनी, रात-चौगुनी गति से बढ़ने लगा, फलने फूलने लगा।

देही धरी का डंड:

वर्णनीय है कि ऋषि, मुनि, संत, गुरु, पीर-फकीर बड़े-बड़े औलिया, महापुरुष जो भी संसार में आए, उन्होंने अपने-अपने समय में तत्कालीन समय व परिस्थितियों के अनुरूप उपरोक्त अनुसार बढ़-चढ़कर परमार्थी कार्य किए और समय अवधि पूरी होने पर यहां से विदा ले गए।

‘शाह मस्ताना पिता प्यारा जी,
इह बाग सजा के टुर चलेआ।
भवसागर ‘च डुबदी बेड़ी (दुनिया) नूं
कंडे पार लगा के टुर चलेया।’

प्रकृति के इसी विधान के अनुसार पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने भी संसार से अपनी विदायगी लेने का निश्चय कर लिया। आप जी ने अपने अंतिम समय के बारे काफी समय पहले ही इशारा कर दिया था। एक दिन महमदपुर रोही दरबार में साध-संगत में बात की कि ‘ताकत का चोला छुड़ाएं तो तुम सिख लोग तो दाग (अंतिम संस्कार) लगाओगे और तुम बिश्नोई लोग दफनाओगे ( धरती में दबाओगे)।’ पूज्य बेपरवाह जी ने अपनी हजूरी में बैठे प्रेमी प्रताप सिंह, रूपा राम बिश्नोई आदि सेवादारों से पूछा, बात की। फिर स्वयं ही फरमाया कि ‘यहां तो रौला पड़ जाएगा।

यहां पर चोला नहीं छोड़ेंगे।’ इसी प्रकार रानियां दरबार में भी बात की कि ‘शो’ (चोला छोड़ना, जनाजा निकालना) रानियां से निकालें या दिल्ली से?’ फिर स्वयं ही फरमाया कि ‘दिल्ली से ठीक रहेगा।’ आप जी ने 28 फरवरी 1960 को अपने जाने से लगभग 2 महीने पहले ही पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को बतौर दूसरे पातशाह डेरा सच्चा सौदा में स्वयं गद्दीनशीन किया। आप जी ने डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत की सेवा-संभाल की तमाम जिम्मेदारियां भी उसी दिन अपने उत्तराधिकारी पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज को सौंपते हुए साध-संगत में

वचन फरमाए-

दुनिया रब्ब नू ढूंढण जाए जी, सतनाम नूं लभ्भ असीं लिआए जी,
इहदा भेद (राज) की दुनिया पाए जी, खुद भेद बता के टूर चलेया।
शाह मस्ताना पिता प्यारा जी, इह बाग सजा के टुर चलेआ।

‘ये वोही सतनाम है, जिसे दुनिया जपदी-जपदी (लभदी-लभदी) मर गई। असीं अपने दाता सावण शाह साईं जी के हुक्म से इन्हें (पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की तरफ ऐसे उंगली का इशारा करके साध-संगत में फरमाया) अर्शों से लाकर तुम्हारे सामने बिठा दिया है। जो कोई पीठ पीछे से भी दर्शन करेगा, इनका नाम उच्चारण करेगा, नर्कों में नहीं जाएगा। यह अपनी दया-मेहर से उसका पार-उतारा करेंगे।’ इस प्रकार सच्चे पातशाह शाह मस्ताना जी महाराज अपने सतगुरु कुल मालिक द्वारा सौंपे जीवोद्धार के परोपकारी कार्यों को पूर्ण मर्यादापूर्वक पूरा करते हुए 18 अप्रैल 1960 को अपना पंच भौतिक शरीर त्यागकर ज्योति-ज्योत समा गए।

मानवता की सेवा में समर्पित:

पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के इस पवित्र दिन (पावन स्मृति) को पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने मानवता की सेवा में समर्पित करते हुए डेरा सच्चा सौदा में याद-ए-मुर्शिद नि:शुल्क पोलियो व अपंगता (नि:शक्तता/विकलांगता) निवारण कैंप का आयोजन शुरू करवाया है। पूज्य गुरु जी की प्रेरणा अनुसार डेरा सच्चा सौदा में हर साल इस परमार्थी कैंप के माध्यम से पोलियो पीड़ित मरीजों की नि:शुल्क जांच की जाती है और चयनित मरीजों के आॅपरेशन से लेकर फिजियोथेरेपी आदि सभी मेडिकल सेवाएं मुफ्त प्रदान की जाती हैं। इस दौरान जरूरतमंदों को कैलीपर भी मुफ्त दिए जाते हैं।

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